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Friday, 5 October 2018

"साहस"

"साहस"

गिर कर, उठता जा रहा था..
बनता नहीं, पर बनाता जा रहा था..
दुनिया ने तड़पाया हर वक्त..
वक्त की सुइयों से चुभोया..

करता क्या न करता..
साहस करता और दिखाता चला जा रहा था..।।
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Wednesday, 26 September 2018

" समाजवाद एवं साम्यवाद " में अंतर

समाजवाद : प्रथम विश्वयुद्ध, समाजवादी आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी। जहाँ एक ओर तो इसके आरंभ होते ही समाजवादी आंदोलन और उनका अंतरराष्ट्रीय संगठन प्राय: छिन्न-भिन्न हो गया वहीं दूसरी ओर इसके बीच रूस में बोल्शेविक क्रांति (अक्टूबर-नंवबर 1917) हुई और संसार में प्रथम सफल समाजवादी राज्य की नींव पड़ी जिसका संसार के समाजवादी आंदोलनों पर गहरा असर पड़ा। प्रथम महायुद्ध के पूर्व समाजवादी दलों का मत था कि पूंजीवादी व्यवस्था ही युद्धों के लिए उत्तरदायी है और यदि विश्वयुद्ध आरंभ हुआ तो प्रत्येक समाजवादी दल का कर्तव्य होना चाहिए कि वह अपनी पूँजीवादी सरकार की युद्धनीति का विरोध करे और गृहयुद्ध द्वारा समाजवाद की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हो। परंतु ज्यों ही युद्ध आरंभ हुआ, रूस और इटली के समाजवादी दलों को छोड़कर शेष सब दलों के बहुमत ने अपनी सरकारों की नीति का समर्थन किया। समाजवादियों के केवल एक नगण्य अल्पमत ने ही युद्ध का विरोध किया और आगे चलकर इनमें से कुछ व्लादिमीर लेनिन और उसके साम्यवादी अंतरराष्ट्रीय संगठन के समर्थक बने। परंतु विभिन्न देशों के समाजवादी आंदोलनों की परस्पर विरोधी युद्धनीति के कारण उनका ऐक्य खत्म हो गया।।

साम्यवाद : कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित तथा साम्यवादी घोषणापत्र में वर्णित समाजवाद की चरम परिणति है। साम्यवाद, सामाजिक-राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत एक ऐसी विचारधारा के रूप में वर्णित है, जिसमें संरचनात्मक स्तर पर एक समतामूलक वर्गविहीन समाज की स्थापना की जाएगी। ऐतिहासिक और आर्थिक वर्चस्व के प्रतिमान ध्वस्त कर उत्पादन के साधनों पर समूचे समाज का स्वामित्व होगा। अधिकार और कर्तव्य में आत्मार्पित सामुदायिक सामंजस्य स्थापित होगा। स्वतंत्रता और समानता के सामाजिक राजनीतिक आदर्श एक दूसरे के पूरक सिद्ध होंगे। न्याय से कोई वंचित नहीं होगा और मानवता एक मात्र जाति होगी। श्रम की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ और तकनीक का स्तर सर्वोच्च होगा। साम्यवाद सिद्धांततः अराजकता का पोषक हैं जहाँ राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मूलतः यह विचार समाजवाद की उन्नत अवस्था को अभिव्यक्त करता है। जहाँ समाजवाद में कर्तव्य और अधिकार के वितरण को 'हरेक से अपनी क्षमतानुसार, हरेक को कार्यानुसार' (अंग्रेज़ी: From each according to her/his ability, to each according to her/his work) के सूत्र से नियमित किया जाता है, वहीं साम्यवाद में 'हरेक से क्षमतानुसार, हरेक को आवश्यकतानुसार' (अंग्रेज़ी: From each according to her/his ability, to each according to her/his need) सिद्धांत का लागू किया जाता है। साम्यवाद निजी संपत्ति का पूर्ण प्रतिषेध करता है।।

Tuesday, 25 September 2018

“ ‘सांप्रदायिक सहृदता ’और हिन्दी साहित्य’’

आज की संगोष्ठी का विषय “ ‘सांप्रदायिक सहृदता ’और हिन्दी साहित्य’’ वर्तमान की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज के भौतिकवादी युग में सामान्य व्यक्ति मानसिक तानावों से ग्रस्त होता चला जा रहा है । आज समस्त दुनिया में आतंक का माहौल फैला हुआ है, सत्ता,लालसा,धर्म विद्वेष जैसे मद्दे गंभीर रूप में चुनौती ही बने हैं । मानव जाति के लिए आपसी सौहार्द या सद्भाव होना अत्यंत आवश्यक है। आज सभी ‘सांप्रदायिक’ शब्द के अर्थ से परिचित हैं, ‘संप्रदाय’ से ही ‘सांप्रदायिक’ शब्द जन्म हुआ है यानि मार्ग,पंथ ,रीति, गुरु मंत्र अर्थ शब्द कोश में मिलते हैं। ‘सौहार्द’-सुहृदय शब्द से आया जिसका अर्थ है- मित्रता,आत्मीयता,मित्रत्व आदि, प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या आज इन शब्दों के मायने या महत्व किन अर्थों में बचा है ? आज ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ बनाए रखने की अधिक आवश्यकता है।
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