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Tuesday, 25 September 2018

“ ‘सांप्रदायिक सहृदता ’और हिन्दी साहित्य’’

आज की संगोष्ठी का विषय “ ‘सांप्रदायिक सहृदता ’और हिन्दी साहित्य’’ वर्तमान की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज के भौतिकवादी युग में सामान्य व्यक्ति मानसिक तानावों से ग्रस्त होता चला जा रहा है । आज समस्त दुनिया में आतंक का माहौल फैला हुआ है, सत्ता,लालसा,धर्म विद्वेष जैसे मद्दे गंभीर रूप में चुनौती ही बने हैं । मानव जाति के लिए आपसी सौहार्द या सद्भाव होना अत्यंत आवश्यक है। आज सभी ‘सांप्रदायिक’ शब्द के अर्थ से परिचित हैं, ‘संप्रदाय’ से ही ‘सांप्रदायिक’ शब्द जन्म हुआ है यानि मार्ग,पंथ ,रीति, गुरु मंत्र अर्थ शब्द कोश में मिलते हैं। ‘सौहार्द’-सुहृदय शब्द से आया जिसका अर्थ है- मित्रता,आत्मीयता,मित्रत्व आदि, प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्या आज इन शब्दों के मायने या महत्व किन अर्थों में बचा है ? आज ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ बनाए रखने की अधिक आवश्यकता है।
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